प्रो. सैयद ई. हसनैन ने वर्ष 2005 से वर्ष 2011 तक हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया, और वे संस्थान के इतिहास में प्रमुख शैक्षणिक प्रशासकों में से एक के रूप में जाने जाते हैं। इस भूमिका को निभाने से पहले ही वे एक सम्मानित वैज्ञानिक के रूप में मान्यताप्राप्त थे और उन्हें आणविक जीवविज्ञान, आनुवंशिकी, जैव प्रौद्योगिकी और विज्ञान नीति में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी। हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल संस्था के लिए शैक्षणिक विकास, अनुसंधान उत्कृष्टता और राष्ट्रीय मान्यता को चिह्नित करता है।

एक प्रशासक से पहले एक वैज्ञानिक
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शीर्ष दायित्व निभाने से बहुत पहले, प्रोफेसर हसनैन ने खुद को एक प्रमुख वैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर लिया था। उनके शोध कार्य में जीन अभिव्यक्ति, जेनेटिक्स, सेल बायोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और इम्यूनोलॉजी सहित कई क्षेत्र शामिल थे। इस दौरान उन्होंने दुनिया की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं जैसे नेचर मेडिसिन, PNAS (यूएसए) और लैंसेट आदि में 300 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए। उन्होंने 30 से अधिक पेटेंट भी प्राप्त किए और 160 से अधिक पीएच.डी., एम.डी. और पोस्टडॉक्टोरल विद्वानों मार्गदर्शन कर वैज्ञानिकों की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में भी एक महती भूमिका निभाई।

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी), हैदराबाद केंद्र के पहले निदेशक (1999-2005) के रूप में उनके सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिक योगदानों में से एक भारतीय बासमती चावल की डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के क्षेत्र में था। उनके कार्य ने वैज्ञानिक रूप से भारतीय बासमती की अनूठी आनुवंशिक पहचान को साबित किया, जो पाकिस्तान के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय मामले में भारत की जीत में एक निर्णायक कारक बन गया। इससे भारत को यूनाइटेड किंगडम में बासमती चावल का निर्यात जारी रखने की अनुमति मिली और एक बड़े आर्थिक नुकसान को रोका गया। इस उपलब्धि के बाद, वाणिज्य मंत्रालय, भारत सरकार ने सीडीएफडी-एपीईडीए बासमती डीएनए विश्लेषण केंद्र की स्थापना की, जहाँ भारत से सभी बासमती निर्यात प्रमाणित किए गए थे। इस कार्य ने स्पष्ट रूप से सिद्ध किया कि वैज्ञानिक अनुसंधान राष्ट्रीय हितों का सीधे समर्थन कैसे कर सकता है।

प्रो. हसनैन के शोध ने आनुवंशिक रोगों, लुप्तप्राय प्रजातियों और संक्रामक रोगों को समझने में भी प्रमुख योगदान किया। उनके काम ने भारत में प्रारंभिक जन्मजात ग्लौकोमा और मल्टीड्रग-प्रतिरोधी तपेदिक की उन्नत आणविक समझ जैसी स्थितियों के आनुवंशिक कारणों की पहचान करने में मदद की। क्षय रोग (टीबी) का कारण बनने वाले बैक्टीरिया पर उनके काम से भारत और विदेशों में प्रमुख नीतिगत निर्णय लिए गए, जिसमें मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के लिए विश्व स्तर पर रिफाम्पिसिन एक सरोगेट मार्कर के रूप में उपयोग और टीबी बैक्टीरियम के भारतीय नैदानिक आइसोलेट्स की विशिष्ट आनुवंशिक पहचान दिखाने वाले उनके काम के आधार पर भारत में ELISA आधारित टीबी निदान को रोकना शामिल है। उन्होंने भारत में पहली बार एक चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण जीवाणु के जीनोम को अनुक्रमित करने में अग्रणी भूमिका निभाई, जिसे बाद में उन्होंने माइकोबैक्टीरियम इंडिकस प्राणाई का नाम दिया। इन प्रयासों के माध्यम से वे न केवल एक प्रयोगशाला वैज्ञानिक के रूप में जाने गए बल्कि एक शोधकर्ता के रूप में पहचाने गए जिनके काम ने वास्तविक दुनिया को प्रभावित किया।

मान्यता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी
उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों के चलते प्रो. हसनैन को कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। इनमें पद्मश्री, शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और जर्मनी के संघीय गणराज्य से ऑडर ऑफ मेरिट (दास वर्डिएन्सटक्रेज, 1. क्लासे, जो भारत के भारत रत्न सम्मान के समकक्ष है) आदि शामिल हैं। उन्हें अमेरिकन एकेडमी ऑफ माइक्रोबायोलॉजी के फेलो के रूप में चुना गया। वे जर्मन नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज लियोपोल्डिना के सदस्य बने, जो दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे सम्मानित विज्ञान अकादमियों में से एक है, जिससे 150 से अधिक नोबेल पुरस्कार विजेता सदस्य के रूप में जुड़े हैं। उन्हें आईसीएमआर के बी.आर. आंबेडकर पुरस्कार, बायोमेडिकल अनुसंधान में उत्कृष्टता के लिए सर्वोच्च पुरस्कार; जी.डी. बिड़ला पुरस्कार; शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (भारत का नोबेल पुरस्कार माना जाता है और प्रधानमंत्री द्वारा दिया जाता है); फिक्की पुरस्कार (भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है); जे.सी. बोस नेशनल फेलो पुरस्कार; रैनबैक्सी रिसर्च पुरस्कार; गोयल पुरस्कार; भसीन पुरस्कार आदि कई अन्य अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले हैं। अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों में दुर्लभ हम्बोल्ट अनुसंधान पुरस्कार (अलेक्जेंडर-वॉन-हम्बोल्ट फाउंडेशन, जर्मनी); रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट, बर्लिन की बहुत विशिष्ट रॉबर्ट कोच फेलोशिप; आदि भी इसमें शामिल हैं। वे क्वींस यूनिवर्सिटी, यूके (रसेल ग्रुप ऑफ यूनिवर्सिटीज के सदस्य, जिसमें ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, इंपीरियल कॉलेज आदि शामिल हैं) से मानद डॉक्टरेट (2011) प्राप्त करने वाले तीसरे भारतीय (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, 2009, डॉ. अमर्त्य सेन, 2010 के बाद) हैं।

अपने शोध के साथ-साथ प्रो. हसनैन ने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ भी निभाईं। उन्होंने प्रधानमंत्री (2005-2014) की विज्ञान सलाहकार परिषद के सदस्य के रूप में और केंद्रीय मंत्रिमंडल की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में कार्य किया। आपने कई राज्य सरकारों के लिए सलाहकार के रूप में कार्य किया और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू और भारतीय प्रबंधन संस्थान, कोझीकोड; यूजीसी; एसईआरबी; केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे प्रमुख संस्थानों की शासी परिषदों में कार्य किया। ये सम्मान उनके वैज्ञानिक निर्णय और नेतृत्व में दिखाए गए भरोसे के प्रतीक हैं।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति
जब प्रोफेसर हसनैन ने 2005 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला, तो वे अपने साथ अनुसंधान, शैक्षणिक गुणवत्ता और संस्थागत शासन की गहरी समझ ले कर आए थे। एक वैज्ञानिक के रूप में उनकी पृष्ठभूमि ने एक प्रशासक के रूप में उनकी प्राथमिकताओं को दृढ़ता से आकार दिया। उन्होंने शोध परिणामों को मजबूत करने, उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशनों को प्रोत्साहित करने और अकादमिक उत्कृष्टता की संस्कृति के निर्माण पर अत्यधिक जोर दिया।

उनके कार्यकाल के दौरान, हैदराबाद विश्वविद्यालय ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की। अंतर्राष्ट्रीय SCOPUS डेटाबेस के अनुसार विश्वविद्यालय भारत में शीर्ष रैंक वाले विश्वविद्यालय के रूप में उभरा, जो इसके अनुसंधान की गुणवत्ता और प्रभाव को दर्शाता है। इसे NAAC से 97 प्रतिशत असाधारण समग्र मान्यता स्कोर भी मिला, जो मजबूत शैक्षणिक पाठ्यक्रमों, शासन, बुनियादी ढाँचे और अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण को रेखांकित करता है। विश्वविद्यालय ने QS रैंकिंग द्वारा एशिया में 34वाँ स्थान प्राप्त करके अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त की, जिससे यह उपमहाद्वीप के प्रमुख विश्वविद्यालयों में शामिल हो गया।

इस अवधि के दौरान एक प्रमुख मान्यता भारत के प्रधानमंत्री से PURSE (विश्वविद्यालय अनुसंधान और वैज्ञानिक उत्कृष्टता संवर्धन) अनुदान की प्राप्ति थी। इस पुरस्कार ने वैज्ञानिक अनुसंधान में विश्वविद्यालय के महत्व को स्वीकार किया और इसके अनुसंधान बुनियादी ढाँचे और गतिविधियों का समर्थन करने में सहायता की।

प्रोफेसर हसनैन ने विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया। उनका एक महत्वपूर्ण योगदान हैदराबाद विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर की शुरुआत और विकास था। इस विस्तार ने एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित किया और शैक्षणिक कार्यक्रमों और अनुसंधान गतिविधियों के लिए अतिरिक्त स्थान बनाया और आज यह विश्वविद्यालय का एक प्रमुख शैक्षणिक और आवासीय केंद्र बन गया है। कई विषयों में 5 साल के एकीकृत मास्टर्स कार्यक्रम का आरंभ किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए एक विशिष्ट पहल थी जो आज विश्वविद्यालय में छात्र संख्या में समग्र वृद्धि में योगदान कर रहा है।

उन्होंने अलग-अलग विषयों में सहयोग को प्रोत्साहित किया और एक ऐसे शैक्षणिक वातावरण का समर्थन किया जहाँ अनुसंधान और शिक्षण एक साथ आगे बढ़ सके। उनके कार्यकाल में यूजीसी, डीबीटी (उत्कृष्टता केंद्र सहित) और अन्य मंत्रालयों द्वारा विश्वविद्यालय को मिलने वाली अनुसंधान निधि में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई। अपने कार्यकाल के दौरान, हैदराबाद विश्वविद्यालय देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय बन गया, और आज तक बना हुआ है, जिसके 3 संकाय-सदस्य रॉयल सोसाइटी (एफआरएस) के के फेलो थे।

उनके कार्यकाल के बादः विज्ञान और शिक्षा में निरंतर सेवा
वर्ष 2011 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद प्रोफेसर हसनैन ने उच्च शिक्षा और विज्ञान नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभाना जारी रखा। वे प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली (IIT-D) में पूर्णकालिक प्रोफेसर (आवेदन प्रस्तुत किए बगैर और चयन समिति का सामना किए बिना) बनने के लिए आमंत्रित किए गए एक दर्जन से कम व्यक्तियों में से एक थे, जहाँ आपने सेवानिवृत्ति तक कार्य किया। उन्होंने वर्ष 2011 से 2015 तक जामिया हमदर्द के कुलपति के रूप में भी कार्य किया, जहाँ विश्वविद्यालय ने प्रतिष्ठित संस्थान (इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस) के रूप में राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त की और उसे देश में 5वें सर्वोच्च रैंकिंग वाले निजी विश्वविद्यालय के रूप में घोषित किया गया। उनके कार्यकाल के दौरान और उसके बाद भी जामिया हमदर्द कई वर्षों तक फार्मेसी में नंबर एक का स्थान पर रहा और इसके अनुसंधान वित्त पोषण और संस्थागत क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई।

विश्वविद्यालय शीर्ष प्रशासन के साथ-साथ प्रो. हसनैन ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक निकायों के साथ अपना जुड़ाव जारी रखा। वे विज्ञान नीति, सलाहकार भूमिकाओं और वैश्विक शैक्षणिक नेटवर्क में शामिल रहे। प्रतिष्ठित नेशनल साइंस चेयर के पहले 5 प्राप्तकर्ताओं में से एक, वे शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में विशिष्ट प्रोफेसर भी हैं जहाँ वे टीबी पर बहुत सक्रिय शोध समूह का नेतृत्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय अकादमियों, सलाहकार बोर्डों और अनुसंधान संगठनों के साथ उनका निरंतर संबंध औपचारिक प्रशासनिक भूमिकाओं के बाद भी विज्ञान और उच्च शिक्षा में उनके निरंतर योगदान को दर्शाता है।

एक स्थायी विरासत
प्रो. सैयद ई. हसनैन की यात्रा वैज्ञानिक उत्कृष्टता, विचारशील नेतृत्व और सार्वजनिक सेवा का एक दुर्लभ संयोजन संगम है। अनुसंधान में उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों ने उन्हें सीडीएफडी-हैदराबाद, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जामिया हमदर्द सहित प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों का नेतृत्व करने की विश्वसनीयता और दूरदर्शिता प्रदान की। हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल मजबूत अकादमिक और वित्तीय विकास और पहचान के दौर के रूप में जाना जाता है।

विज्ञान को प्रशासन और नीति से जोड़कर, उन्होंने यह दिखाया किया कि कैसे शैक्षणिक नेतृत्व संस्थानों को आकार दे सकता है और राष्ट्रीय हितों की सेवा कर सकता है। माइक्रो—मैनेंजमेंट से दूर रहने वाले व्यक्ति के रूप में उन्होंने पहली बार हैदराबाद विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों को सम-कुलपति के रूप में नियुक्त किया ताकि वे कार्य को सुगम कर सकें और विश्वविद्यालय को विकास के पथ पर आगे ले जा सकें, साथ ही अपना वैज्ञानिक कार्य भी जारी रख सकें।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति शृंखला के भाग के रूप में प्रो. हसनैन का यह विवरण अनुसंधान आधारित नेतृत्व, संस्थागत विकास और स्थायी प्रभाव द्वारा परिभाषित एक अध्याय का प्रतिनिधित्व करता है। उनका काम छात्रों, शोधकर्ताओं और शैक्षणिक अगुआओं को प्रेरित करता रहता है जो संस्थानों और समाज में परिवर्तन के लिए ज्ञान की शक्ति पर विश्वास करते हैं।