भारतीय भाषाओं के मध्य साहित्यिक और सांस्कृतिक समरसता को उद्घाटित करने के उद्देश्य से हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 9–10 अक्तूबर, 2025 को ‘भारतीय भाषाओं की अंतःसंवादिता: साहित्य, संस्कृति और समाज’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया।

संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र 9 अक्तूबर को प्रातः 10.30 बजे प्रारंभ हुआ, जिसमें विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. देवेश निगम मुख्य अतिथि के रूप उपस्थित रहे। संगोष्ठी में बीज व्याख्यान देते हुए प्रख्यात भाषाविद् प्रो. माणिक्यांबा ‘मणि’ ने भारतीय भाषाओं के बीच भाषाई अंतर्संबंधों पर गहन चर्चा की। संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. तंगमणिअम्मा (त्रिवेन्द्रम विश्वविद्यालय, केरल), प्रो. शशि मुदिराज (हैदराबाद) और प्रो. पुलिकोंडा सुब्बा चारी (द्रविड विश्वविद्यालय) उपस्थित थे। प्रो. विष्णु सरवदे ने अतिथियों का स्वागत किया और प्रो. चर्ला अन्नूपर्णा ने संगोष्ठी परिचय प्रस्तुत किया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. एम.टी. अन्सारी (अध्यक्ष, मानविकी संकाय) ने की। इस अवसर पर प्रो. अन्नपूर्णा द्वारा संपादित और दक्षिण भारतीय भाषाओं के मध्य अनुवाद की समस्याओं पर आधारित ‘संकल्य’ पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण किया गया।

चार सत्रों में आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं लेखकों ने भाग लिया, प्रो. प्रभाशंकर प्रेमी (बेंगलुरू विश्वविद्यालय, कर्नाटक), प्रो. चंद्रशेखर रेड्डी (आंध्रप्रदेश), प्रो. सुनीता मंजनबैल (कर्नाटक केन्द्रीय विश्वविद्यालय, कर्नाटक), डॉ. पद्मावती (कोयंबत्तूर) तमिलनाडु, डॉ. एम. सुधा (हैदराबाद), प्रो. विद्यानंद आर्य (उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद) प्रो. गजेन्द्र पाठक (हैदराबाद), प्रो. श्यामराव (हैदराबाद), प्रो. आंजनेयुलु (हैदराबाद), डॉ. मालोबिका, (अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय), डॉ. नागेश्वर राव (कंचीकामकोटी संस्कृत विश्वविद्यालय, तमिलनाडु) और डॉ. अमरनाथ प्रजापति (विजयपुर कर्नाटक) सहित दक्षिण भारत के अनेक विद्वानों ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।

इस विषय पर अध्ययन एवं शोधकार्य करने के लिए देश के युवाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया जिसमें 14 शोधार्थियों व विद्यार्थों ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए, जिसका संचालन प्रो. एम. श्यामराव ने किया।

संगोष्ठी का प्रमुख आकर्षण समापन सत्र रहा जिसमें प्रख्यात हिंदी-तेलुगु अनुवादक, जिन्होंने मानस सहित तुलसीदास अनेक कृतियों का तेलुगु अनुवाद किया है, डॉ. कमल कुमारी का सम्मान किया गया। इस सत्र में भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली से प्रो. आर.एस. सर्राजु जी ने भारतीय भाषा के मध्य गैर-साहित्यिक पाठों के अनुवाद की आवश्यकता और समिति द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों से परिचित कराया। इस सत्र के विशेष अतिथि प्रो. के.एल. वर्मा (कुलपति, छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय, नवी मुंबई) ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली का परिचय देते हुए उसकी अंतःसंवाहिता पर अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. वी कृष्ण, हिंदी विभाग, है.वि.वि. ने की।

संगोष्ठी का एक अन्य प्रमुख आकर्षण सरोजिनी नायडू कला एवं संचार संकाय के संगीत विभाग द्वारा आयोजित भजन संध्या रही। इस कार्यक्रम में प्रख्यात गायिका डॉ. अस्मिता मिश्रा ने तुलसी, सूर, कबीर और मीराबाई के प्रसिद्ध पदों की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।

इस संगोष्ठी में नगरद्वय से लगभग 200 से अधिक लेखकों, शोधार्थियों वि विद्यार्थियों ने भाग लिया। संगोष्ठी-संयोजक डॉ जे. आत्माराम द्वारा सभी वक्ताओं, विशिष्ट अथियों एवं शोधार्थियों-विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करने साथ यह संगोष्ठी संपन्न हुई।

प्रेषक: डॉ. जे. आत्माराम, संयोजक, राष्ट्रीय संगोष्ठी, हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय