जाने-माने वैज्ञानिक और अकादमिक प्रशासक प्रो. रामकृष्ण रामस्वामी ने जून 2011 से जनवरी 2015 तक हैदराबाद विश्वविद्यालय के 8वें कुलपति के रूप में कार्य किया। उनका कार्यकाल विश्वविद्यालय के विकास में एक महत्वपूर्ण दौर था, विशेष रूप से अंतर्विषयक विस्तार और संस्थागत दूरदर्शिता के माध्यम से आपने विश्वविद्यालय के अकादमिक और अनुसंधान परिदृश्य को सुदृढ़ बनाया।
प्रो. रामस्वामी की शिक्षा का आरंभ मई 1972 में मद्रास के लोयोला कॉलेज से रसायन विज्ञान में बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री के साथ हुआ। इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से रसायन विज्ञान में मास्टर ऑफ साइंस की पढ़ाई की और मई 1974 में उपाधि प्राप्त की। फिर वे डॉक्टरेट अनुसंधान के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने सितंबर 1978 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में अपनी पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की।

अनुसंधान योगदान और अन्य महत्वपूर्ण कार्य
अपनी शिक्षा-यात्रा के दौरान आपने एक विशिष्ट शोध-विधि अपनाई, जो मुख्य रूप से नॉनलीनियर डायनामिक्स और जटिल प्रणालियों पर केंद्रित थी। उनका कार्य भौतिक और जैविक परिघटनाओं को समझने के लिए सैद्धांतिक और कम्प्यूटेशनल दृष्टिकोणों के साथ उनके गहन अनुसंधान को दर्शाता है। उनके अनुसंधान के क्षेत्रों में रासायनिक गतिकी, क्लासिकल और क्वांटम केयॉस, सेमी-क्लासिकल क्वांटमीकरण, अव्यवस्थित प्रणालियाँ, सांख्यिकीय भौतिकी, आणविक गतिकी और क्लस्टर भौतिकी शामिल हैं। बाद के वर्षों में, उनकी विद्वत्ता का विस्तार कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञान और जीनोमिक्स तक हुआ, जो एक निरंतर विकसित होते हुए अंतर्विषयक रुझान को दर्शाता है।
शिक्षण और अकादमिक करियर
1986 से लेकर अक्टूबर 2018 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, प्रो. रामस्वामी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अध्यापन कार्य किया; जहाँ उन्होंने स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज़ में सह-प्रोफेसर (1986–1990) और प्रोफेसर (1990–2018) के रूप में सेवाएँ दीं। इसके अतिरिक्त, 2002 से 2018 तक वे जेएनयू के ‘सेंटर फ़ॉर कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी एंड बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स’ में भी प्रोफेसर रहे।

औपचारिक सेवानिवृत्ति के उपरांत भी अध्यापन और मार्गदर्शन के प्रति उनका समर्पण निरंतर बना रहा। अक्टूबर 2023 तक, वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के रसायन विज्ञान विभाग में ‘विज़िटिंग प्रोफेसर’ के पद पर कार्यरत थे। संप्रति वे ‘भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान’ (IISER), बरहामपुर में ‘मानद प्रोफेसर’ के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
राष्ट्रीय भूमिकाएँ – शैक्षणिक और प्रशासनिक
हैदराबाद विश्वविद्यालय में कार्यभार संभालने से पहले, प्रो. रामस्वामी ने जेएनयू में प्रशासनिक पदों पर कार्य किया; उन्होंने स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज़ (1992-94, 1999-2001) के डीन और स्कूल ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (2002-2004) के डीन के रूप में सेवाएँ प्रदान की।

है.वि.वि. के कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने हैदराबाद स्थित ‘राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद’ के अध्यक्ष के रूप में राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन किया और अप्रैल 2012 से जनवरी 2015 तक इस पद पर बने रहे।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति
कुलपति के रूप में प्रो. रामस्वामी ने एक ऐसे दृष्टिकोण को प्रस्तुत और कार्यान्वित किया, जो अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने, अंतर्विषयकता को बढ़ावा देने तथा शैक्षणिक कार्यक्रमों को उभरते वैश्विक ज्ञान प्रवृत्तियों के साथ जोड़ने पर केंद्रित था।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर उनके कार्यकाल में बुनियादी ढाँचे और शैक्षणिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास हुआ। उनके कार्यकाल के दौरान कई मौजूदा शैक्षणिक संरचनाओं को पुनर्गठित किया गया: कॉलेज फॉर इंटीग्रेटेड स्टडीज़, अर्थशास्त्र संकाय, गणित और सांख्यिकी संकाय और कंप्यूटर और सूचना विज्ञान संकाय को अलग-अलग संस्थाओं के रूप में स्थापित किया गया। दो वर्षीय ‘मास्टर्स इन पब्लिक हेल्थ’ (MPH) कार्यक्रम शुरू किया गया, और साथ ही शिक्षण तथा अनुसंधान में उत्कृष्टता के लिए वार्षिक ‘कुलाधिपति पुरस्कार’ की भी शुरुआत की गई। बुनियादी ढाँचे के संबंध में, परिसर में नए निर्माण कार्यों में कुलपति लॉज और ज़ाकिर हुसैन कॉम्प्लेक्स शामिल हैं; इसके अलावा, जीव विज्ञान भवन, बीएसएल-3 सुविधा और रसायन विज्ञान संकाय का नेटवर्किंग रिसोर्स सेंटर भी बनकर तैयार हो गया।

प्रो. रामस्वामी ने इंदिरा गांधी स्मारक पुस्तकालय में की छत पर 100KW के सोलर पावर प्लांट की स्थापना का कार्य भी अपनी देखरेख में पूरा किया, जो संधारणीयता (सस्टेनेबिलिटी) के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रयोगशालाओं, कम्प्यूटेशनल संसाधनों और सहयोगी अनुसंधान सुविधाओं में निवेश के माध्यम से पूरे विश्वविद्यालय में अनुसंधान बुनियादी ढाँचे को मजबूत किया गया। उन्होंने विभागों के बीच अंतर्विषयक जुड़ाव को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा शैक्षणिक साझेदारियों को बढ़ावा दिया। संकाय विकास एक मुख्य प्राथमिकता बनी रही, जिसमें भर्ती, मार्गदर्शन और पेशेवर विकास पर जोर दिया गया।
विश्वविद्यालय का ऑनलाइन न्यूज़लेटर – यूओएच हेराल्ड उनके कार्यकाल के दौरान शुरू किया गया था और आज तक इसके 5500 से अधिक अपलोड हो चुके हैं।

पेशेवर नियुक्तियाँ
प्रो. रामस्वामी का अकादमिक नेतृत्व कई राष्ट्रीय वैज्ञानिक निकायों और विश्वविद्यालयों तक फैला हुआ था। उन्होंने 2016 से 2018 तक इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज़, बेंगलुरू के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया; इससे पहले, 2013 और 2015 के बीच उन्होंने इसी एकेडमी में उपाध्यक्ष और प्रकाशन संपादक के रूप में भी सेवाएँ दी थीं। वर्ष 2015 में, वे इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष थे।
उनकी शोध यात्रा में प्रतिष्ठित शोध संस्थानों में फेलोशिप भी शामिल थीं। वे 1983 से 1986 तक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बॉम्बे में फेलो रहे, और 1981 से 1983 तक वहीं विज़िटिंग फेलो के रूप में कार्यरत रहे। अपनी पीएच.डी. पूरी करने के तुरंत बाद, 1978 से 1980 तक वे कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पासाडेना में पोस्टडॉक्टोरल फेलो थे।
विज़िटिंग पद और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
प्रो. रामस्वामी के अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक जुड़ाव निरंतर वैश्विक सहयोग को दर्शाते हैं। जनवरी–फरवरी 2010 के दौरान वे टोक्यो विश्वविद्यालय से जुड़े रहे। इससे पहले, 2004–2005 के दौरान वे प्रिंसटन स्थित ‘इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी’ के सदस्य थे। इसके अतिरिक्त, जनवरी से मार्च 1994 तक उन्होंने कैम्ब्रिज स्थित ‘आइज़ैक न्यूटन इंस्टीट्यूट फॉर मैथमेटिकल साइंसेज़’ में और 1989–1990 के दौरान ओकाज़ाकी स्थित ‘इंस्टीट्यूट फॉर मॉलिक्यूलर साइंस’ में रेज़िडेंसी भी की।

पुरस्कार और सम्मान
उनके वैज्ञानिक और अकादमिक योगदान को कई प्रतिष्ठित सम्मानों के माध्यम से मान्यता मिली है। उन्होंने 2010 में भौतिकी में डीएई राजा रमन्ना व्याख्यान दिया और 2009 में टीआईएफआर पूर्व छात्र संघ उत्कृष्टता पुरस्कार प्राप्त किया। 2008 में, उन्हें भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जे.सी. बोस फेलोशिप से सम्मानित किया गया। इससे पहले, उन्हें 2007 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का फेलो और 1993 में भारतीय विज्ञान अकादमी का फेलो चुना गया था। एक वैज्ञानिक के रूप में उनकी शुरुआती प्रतिभा को 1985 में ‘युवा वैज्ञानिकों के लिए INSA पदक’ और ‘राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिभा छात्रवृत्ति’ के माध्यम से पहचाना गया, जो उन्हें 1969 से 1974 तक मिली थी।

अंतर्राष्ट्रीय पहचान में 2000 से 2001 तक ‘सांता फे इंस्टीट्यूट इंटरनेशनल फेलो’ के रूप में उनका जुड़ाव और 1996 से 2001 तक ट्रिएस्टे स्थित ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स’ (आईसीटीपी) में वरिष्ठ सहयोगी के रूप में उनका कार्य शामिल है; इससे पहले वे 1988 से 1993 तक आईसीटीपी के सहयोगी भी रहे थे। 2008 में, उन्हें टीडब्ल्यूएएस — ‘द वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज’ का फेलो चुना गया।
संपादकीय और प्रकाशन में योगदान
प्रो. रामस्वामी ने वैज्ञानिक प्रकाशन को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे 2019 से ‘जर्नल ऑफ फिज़िक्स: कॉम्प्लेक्सिटी’ के संपादकीय बोर्ड में और 2015 से ‘जर्नल ऑफ नॉन-लीनियर साइंस’ के संपादकीय बोर्ड में कार्यरत हैं। 2000 से 2024 तक, वे ‘हिंदुस्तान बुक एजेंसी’ की ‘टेक्स्ट्स एंड रीडिंग्स इन द फिज़िकल साइंसेज़’ (TRiPS) शृंखला के प्रबंध संपादक रहे।

उन्होंने 2013 से 2015 तक ‘इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज़’ के प्रकाशन संपादक के रूप में और 2008 से 2012 तक ‘प्रमाण – जर्नल ऑफ फ़िज़िक्स’ के एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्य किया; इससे पहले वे 1992 से 2007 तक इसके संपादकीय बोर्ड के सदस्य भी रहे थे। उनकी संपादकीय सेवाओं में 1997 से 2005 तक ‘रेज़ोनेंस: जर्नल ऑफ साइंस एजुकेशन’ और 1991 से 1992 तक ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ केमिकल काइनेटिक्स’ के बोर्ड में निभाई गई भूमिकाएँ भी शामिल हैं।
विरासत
प्रो. रामकृष्ण रामस्वामी का कुलपति के रूप में कार्यकाल को एक स्थायी संस्थागत विरासत कहा जा सकता है। उनके नेतृत्व ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान बुनियादी ढाँचे को मज़बूत किया, इसके शैक्षणिक कार्यक्रमों का विस्तार उभरते हुए क्षेत्रों में किया, और इसकी बौद्धिक संस्कृति में अंतर्विषयक सहयोग को समाहित किया। उनके कार्यकाल के दौरान शुरू की गई पहलें आज भी हैदराबाद विश्वविद्यालय की शैक्षणिक दिशा को आकार दे रही हैं।

एक ऐसे विद्वान के तौर पर, जो संस्थागत शासन में स्पष्टता ले आए, प्रो. रामस्वामी का कुलपति-काल विश्वविद्यालय की अनुसंधान उत्कृष्टता और वैश्विक शैक्षणिक जुड़ाव की दिशा में की गई यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना रहेगा।